मोहे न नारि, नारि के रूपा..

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प्राचीन काल में भारतीय समाज में महिलाओं का स्थान श्रेष्ठ है महिलाऐं गौरव पद की अधिकारिणी भी रही है अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिससे पता चलता है कि समाज में महिलाओं का स्थान पुरुषों से कम नहीं था किंतु कालांतर में महिलाओं की दशा बिगड़ती चली गई और मध्य युग में स्त्रियों की अवस्था विचारणीय हो गई मुसलमान आक्रमणकारियों के अत्याचार से क्षुब्ध होकर स्त्रियों को सामाजिक स्थिति में परिवर्तन करना पड़ा। पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा, कन्यावध (भ्रूण हत्या) कन्या क्रय-विक्रय आदि कृत्यों ने महिलाओं का जीवन एक चारदीवारी में कैद कर दिया। आज भी ग्रामीण एवं मलिन बस्तियों में 96 प्रतिशत तथा शहरों में 60 प्रतिशत महिलाएं पर्दा प्रथा व अन्य कुरीतियों के चलते चारदीवारी में कैद हैं। और अब दहेज प्रथा ने अपने पैर पसार लिए हैं। सरकारी, गैर सरकारी प्रयासों के बावजूद एकता बनी हुई है। सुधार में कोई खास सफलता प्राप्त नहीं है। महिलाएं आज भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं है। अब शर्मनाक विडम्बना यह है कि एक महिला ही दूसरी महिला की दुश्मन बनी हुई है। सास-बहू, ननद-भौजाई व अन्य संबंधों में जरा सी नांकझोंक बड़ी घटना/दुर्घटना का कारण बनते हैं।

महिला ही महिला का पतन करना चाहती है। ‘‘मोहे न नारि नारि के रूपा’’ कहावत पूर्णतः सटीक बैठती है। प्रशासनिक कार्यालयों पर दर्ज शिकायतों ने 90% महिलाओं की समस्या से जुड़ी होती है इसका कारण है समाज की खोखली मानसिकता

एक संस्थागत सर्वे के दौरान प्राप्त जानकारी के मुताबिक महिला ही महिला का पतन करना चाहती है। ‘‘मोहे न नारि नारि के रूपा’’ कहावत पूर्णतः सटीक बैठती है। प्रशासनिक कार्यालयों पर दर्ज शिकायतों ने 90% महिलाओं की समस्या से जुड़ी होती है इसका कारण है समाज की खोखली मानसिकता ।
खोखली मानसिकता- खोखली मानसिकता के कारण ही हमें औलाद का सहयोग प्राप्त नहीं हो पाता है क्योंकि शादी के बाद लड़की सास – ससुर की सेवा नहीं करना चाहती है जबकि स्वयं की औलाद से सेवा करवाने की ख्वाहिशों का अम्बार लगा लेती है अर्थात नवीन पीढ़ी के संस्कारों में सेवाभाव का अभाव रहता है । बच्चे की पहली गुरू उसकी मां होती है जाहिर सी बात है जो आज बहू है वह कल सास भी बनेगी । अधिकांशतः जो स्वयं को पसंद नहीं है वह दूसरों पर थोपने का प्रयास किया जाता है।
जैसे –
1. जो व्यक्ति स्वयं झुकना पसंद नहीं करता है सामने वाले को झुकाना चाहता है।
2. गालियां स्वयं को सुनना बर्दाश्त नहीं परंतु दूसरों के लिए बखान करना स्वयं का रुतवा समझता है।
3. सास का औहदा प्राप्त होने के बाद सुंदर-सुशील बहू पर अनपढ़-गंवार सास अपनी हुकूमत सही अथवा गलत सेवा भाव के साथ करवाना चाहती है जबकि स्वयं के बैकग्राउंड में सेवाभाव का कॉलम हमेशा से खाली पड़ा है।
4. औलाद ना होने पर या बेटी की चाह में तंत्र विद्या, झाड़-फूंक, बाबा भंडारी के आशीर्वाद से संस्कारित संतान की आस लगाते हैं।
5. शादी के दौरान लड़की को उपलब्ध कराई सामग्री (उपहार) पर 30% झूठे मुकदमे दर्ज किए जाते हैं कि लड़की को मार दिया गया और उसी उपहार सामग्री को दहेज का रूप देकर प्रताड़ना प्रदर्शित करने का प्रयास किया जाता है जबकि सच्चाई कुछ और ही होती है। लड़की की मौत किसी लाइलाज बीमारी से हो जाती है। ऐसी स्थिति में पैसे के लालच में डॉक्टर भी झूठी रिपोर्ट बनाने के एक्सपर्ट अपनी कुशलता का प्रदर्शन करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है प्रत्येक समस्या का जिम्मेदार लड़का ही नहीं, लड़की भी है। अक्सर लड़कियां महिलाओं के पक्ष में बने कानून का नाजायज फायदा उठाने का प्रयास करती है।
6. समाचार पत्र TV न्यूज व अन्य सूत्रों से ज्ञात होता है। जब किसी बलात्कार की घटना का बखान होता है तो आरोपी को सलाखों के पीछे फेंक दिया जाता है। जबकि लड़की के बयान में कई बार, कई दिनों से शारीरिक शोषण करने का जिक्र होता है। तब कई प्रश्न जन्म लेते हैं दूसरे शब्दों में जब तक बात 2 पेे 2 थी, शारीरिक समर्पण था। जब बात तीसरे तक (लड़की के अभिभावकों तक) पहुंचती है तब लड़की दबाव में आकर समर्पण को शारीरिक शोषण का भयानक अपराध बनाकर लड़के के माथे थोप दिया जाता है। परिणामतः लड़के के दिमाग में बदले की भावना जन्म लेती है। वह जेल से बाहर निकलने का प्रयास करता है और निकलते ही किसी अप्रिय घटना को अंजाम देता है और इस प्रकार कई हंसती-खेलती जिंदगियां जहन्नुम बन जाती हैं।
7. आधुनिक लड़कियों का पहनावा आकर्षण का केंद्र बिंदु बन गया है और संबंधों को लापरवाही से देखा जा रहा है। पैसे की चकाचैंध ने लड़कियों को समाज में नंगा कर दिया है। परिणाम स्वरुप अपराध जन्म लेता है। समस्याएं तो और भी है जिसकी जिम्मेदार महिला के विरुद्ध कोई अन्य महिला ही प्रदर्शित होती है। महिला जागरण में महिलाओं को जागरुक होना होगा। अपराधी कोई भी हो उसे सबक सिखाने के लिए एकजुट होकर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। भारतीय कानून व्यवस्था महिलाओं के हित में सक्रिय है हमें कानून की मदद से सत्यता के अनुरूप विचार कर समस्याओं के हल पाने के प्रयत्न करने होंगे।
अच्छा पाने के लिए सर्वप्रथम अच्छा करना होगा। सम्मान चाहिए तो सर्वप्रथम सम्मान करना सीखना होगा। अच्छा वक्ता बनने से पहले एक अच्छा श्रोता बनना होगा। सेवा करवाने की इच्छा तभी पूरी होगी जब आप को सेवा करनी आती है।

अर्चना कुशवाहा
समाजसेवी एवं कार्यकत्री
ए. बी. यू. एस.

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